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भारत के किराना स्टोर मॉडल को क्विक कॉमर्स कर रहा है खत्म

Authored By HDFC SKY | Updated at: Sep 9, 2026 01:44 PM IST

भारत के किराना स्टोर मॉडल को क्विक कॉमर्स कर रहा है खत्म

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हमारे आसपास मौजूद किराना दुकानें, उन्हें लंबे समय से भारत की FMCG (Fast-Moving Consumer Goods) सप्लाई चेन की मजबूत नींव माना जाता रहा है, अब एक बड़े खतरे का सामना कर रही हैं।

कई दशकों से किराना स्टोर्स सिर्फ सामान बेचने का जरिया नहीं थीं, बल्कि FMCG कंपनियों के लिए एक मजबूत प्रतिस्पर्धा बढ़त भी थीं।

इन दुकानों के बड़े नेटवर्क की वजह से कंपनियों को कई फायदे मिलते थे- जैसे कंपनियों की मोल-भाव करने की क्षमता , सामान का आसान और बेहतर वितरण, नकद लेन-देन के कारण बेहतर वर्किंग कैपिटल और नए प्रतिद्वंदी के लिए मार्केट में प्रवेश करना मुश्किल होना। लेकिन अब यह पूरा आधार तेजी से कमजोर हो रहा है।

जनरल ट्रेड से मॉडर्न रिटेल फॉर्मेट्स की ओर बदलाव

यह बदलाव अस्थायी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में हो रहा एक स्थायी बदलाव है। सबसे पहले मॉडर्न ट्रेड आया, उसके बाद ई-कॉमर्स और अब क्विक कॉमर्स, जो तेजी से जनरल ट्रेड यानी पारंपरिक दुकानों से मार्केट शेयर छीन रहा है।

इस बदलाव को बड़ी FMCG कंपनियों के सेल्स चैनल में हो रहे बदलाव से साफ देखा जा सकता है। सूचीबद्ध FMCG कंपनियों के लिए अब ई-कॉमर्स का हिस्सा घरेलू राजस्व में लगभग 8–15% हो गया है। HDFC सिक्योरिटीज की रिसर्च रिपोर्ट के  इसमें से 50–70% राजस्व क्विक कॉमर्स के जरिए आ रहा है।

निल्सन के आंकड़ों के मुताबिक, पूरे भारत के शहरी बाजारों में ई-कॉमर्स की हिस्सेदारी 7% है। वहीं, भारत के सभी मेट्रो में यह 16% और देश के टॉप 8 मेट्रो शहर में 19% है।

टॉप मेट्रो में ई-कॉमर्स का मार्केट शेयर हर तिमाही लगभग 1% बढ़ रहा है। यह बदलाव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग स्तर पर दिखाई दे रहा है। साउथ के मेट्रो में ई-कॉमर्स की हिस्सेदारी 22.5% है, जबकि पश्चिमी के मेट्रो में यह 16% है।

उत्तर और पूर्व के मेट्रो में ई-कॉमर्स की हिस्सेदारी करीब 18% है। इन इलाकों में ई-कॉमर्स ने मॉडर्न ट्रेड को पीछे छोड़ दिया है और अब यह दूसरा सबसे बड़ा सेल्स चैनल बन गया है।

निल्सन के मुताबिक, ई-कॉमर्स की यह बढ़त कोई अलग से जुड़ रही ग्रोथ नहीं है, बल्कि इसका बड़ा हिस्सा पारंपरिक दुकानों की मार्केट शेयर को रिप्लेस कर रहा है।इसका मतलब है कि FMCG सेक्टर में लोगों के सामान खरीदने का तरीका और कंपनियों के सेल्स चैनल्स स्थायी रूप से बदल रहे हैं।

क्विक कॉमर्स का इकोनॉमी मॉडल ट्रेडिशनल रिटेल को दे रहा चुनौती

क्विक कॉमर्स और ट्रेडिशनल रिटेल के बिजनेस मॉडल की तुलना करें तो बड़ा अंतर दिखाई देता है। एक सामान्य किराना स्टोर लगभग 200 स्क्वायर फीट में होता है। इसमें करीब 600 अलग-अलग प्रोडक्ट्स (SKUs) होते हैं और इससे सालाना लगभग 30 लाख रुपए का रेवेन्यू आता है। इस हिसाब से उसकी प्रति स्क्वायर फुट सालाना रेवेन्यू लगभग 15,400 रुपए है।

इसके मुकाबले एक क्विक कॉमर्स डार्क स्टोर लगभग 4,000 स्क्वायर फीट में होता है। इसमें करीब 15,000 अलग-अलग प्रोडक्ट्स (SKUs) होते हैं और यह सालाना लगभग 49.3 करोड़ रुपए का रेवेन्यू जनरेट करता है। इसका प्रति स्क्वायर फुट लगभग 1,23,240 रुपए है। यानी क्विक कॉमर्स डार्क स्टोर की प्रति स्क्वायर फुट कमाई एक सामान्य किराना स्टोर से करीब 8 गुना ज्यादा है।

ऑर्डर के आंकड़ों से भी क्विक कॉमर्स के असर को साफ तौर पर समझा जा सकता है।एक सामान्य किराना स्टोर हर महीने करीब 3,950 ऑर्डर पूरा करता है। हर ऑर्डर की औसत वैल्यू लगभग 65 रुपए होती है।

इसके मुकाबले एक क्विक कॉमर्स डार्क स्टोर हर महीने करीब 63,200 ऑर्डर संभालता है और हर ऑर्डर की औसत वैल्यू लगभग 650 रुपए होती है।

वहीं, मॉडर्न ट्रेड इन दोनों के बीच आता है। यह करीब 30,000 स्क्वायर फीट  की जगह में सालाना लगभग 192.4 करोड़ रुपए का राजस्व कमाता है। यहां हर महीने करीब 69,720 ऑर्डर होते हैं और एक ऑर्डर की औसत वैल्यू लगभग 2,300 रुपए होती है। इस चैनल की अलग-अलग खूबियों से यह पता चलता है कि ग्राहकों को किस तरह की सुविधाएं पसंद आ रही हैं।

क्विक कॉमर्स में फास्ट डिलीवरी, सुविधाजनक, बेहतर कीमत, प्रोडक्ट्स की बढ़ती रेंज और प्रोडक्ट से जुड़ी समस्याओं का जल्दी समाधान मिलता है। इसके अलावा फ्रेश प्रोडक्ट को रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज की सुविधा भी होती है।

हालांकि, इसकी कुछ कमियां भी हैं। फ्रेश प्रोडक्ट्स से जुड़ी जरूरतें भी पूरी अच्छी तरह से पूरी नहीं हो पा रही हैं। साथ ही, कस्टमर रिव्यू भी सीमित होते हैं और आमतौर पर सिर्फ स्टार रेटिंग के रूप में मिलते हैं।

ट्रेडिशनल ट्रेड कमजोर होने पर FMCG कंपनियां मॉडर्न रिटेल का रूख अपना रहीं

FMCG कंपनियां अब शहरी बाजारों के लिए अपनी रणनीति पर दोबारा विचार कर रही हैं। उन्हें समझ आ रहा है कि क्विक कॉमर्स सिर्फ एक नया शॉपिंग प्लेटफ़ॉर्म नहीं है, बल्कि यह लोगों के खरीदारी करने के तरीके में बड़ा बदलाव है। अब कंपनियां क्विक कॉमर्स को केवल खतरे के रूप में नहीं देख रही हैं। वे इसे अपने बिजनेस ऑपरेशन को बेहतर बनाने और ज्यादा प्रभावी बनाने के एक अवसर के रूप में भी देख रही हैं।

मौरेको की घरेलू राजस्व में मॉडर्न रिटेल की हिस्सेदारी FY 18 में 13% से बढ़कर FY 26 में 31% हो गई। वहीं, जनरल ट्रेड पर उसकी निर्भरता 87% से घटकर 69% रह गई।

इसी दौरान हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL) की मॉडर्न ट्रेड से आने वाली रेवेन्यू की हिस्सेदारी 11% से बढ़कर अनुमानित 28% हो गई। दूसरी ओर, जनरल ट्रेड की हिस्सेदारी 89% से घटकर 72% रह गई।

ब्रिटानिया, जो लंबे समय से मॉडर्न रिटेल में पीछे रही है, क्योंकि उसके बिस्कुट में छोटे पैक (low-unit packs) की हिस्सेदारी ज्यादा है, उसके लिए भी बदलाव देखने को मिला। कंपनी की ई-कॉमर्स से होने वाली रेवेन्यू की हिस्सेदारी FY 18 में लगभग शून्य थी, जो FY 26 में बढ़कर 6% हो गई।

नेस्ले इंडिया, जो मॉडर्न रिटेल को अपनाने में थोड़ी धीमी रही थी, उसकी जनरल ट्रेड पर निर्भरता FY18 में 90% से घटकर FY 26 में 74% रह गई।

वहीं, कंपनी की ई-कॉमर्स से होने वाली रेवेन्यू की हिस्सेदारी 1% से बढ़कर 15% हो गई। हालांकि, इस दौरान कंपनी की मॉडर्न ट्रेड से होने वाली रेवेन्यू की हिस्सेदारी लगभग 11% पर ही बनी रही।

नए दौर के डिजिटल प्लेटफॉर्म छोटे और नए ब्रांड्स को बड़े ब्रांड्स के बराबर मुकाबला के दे रहे मौका

क्विक कॉमर्स के तेजी से बढ़ने से डायरेक्ट टू कंज्यूमर (D2C) ब्रांड्स को ग्राहकों की खास और अलग-अलग जरूरतों को पहले से ज्यादा बेहतर तरीके से पूरा करने का मौका मिल रहा है।पारंपरिक FMCG कंपनियां अभी भी अपने पुराने जनरल ट्रेड नेटवर्क के आधार पर टॉप-डाउन (top-down) तरीके से बिजनेस करती हैं।

इसके मुकाबले, नई पीढ़ी के ब्रांड्स क्विक कॉमर्स जैसे प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल खास ग्राहकों तक सीधे पहुंचने और उनसे बेहतर तरीके से जुड़ने के लिए कर रहे हैं।

घर और पर्सनल केयर के क्षेत्र में नए दौर के ब्रांड से कंपीटिशन खास तौर पर कुछ चुनिंदा कैटेगरी में काफी बढ़ गया है। ये कैटेगरी कुल मार्केट साइज का लगभग एक-तिहाई हिस्सा हैं। इनमें मुख्य रूप से स्किन केयर, मेल ग्रूमिंग, कलर कॉस्मेटिक्स, शैंपू, बेबी केयर, फ्रेगरेंस, शॉवर जेल और इंटिमेट हाइजीन जैसी कैटेगरी शामिल हैं।

वहीं, कुल कैटेगरी साइज के लगभग 55% हिस्से में नए ब्रांड से कंपीटिशन अभी भी सीमित है। फूड और बेवरेज (पेय) सेक्टर  में भी इसी तरह का बदलाव देखने को मिल रहा है। क्विक कॉमर्स इस सेक्टर को तेजी से संगठित बना रहा है, जहां असंगठित बिजनेस की हिस्सेदारी कम होती जा रही है।

हालांकि, इस बदलाव से इस सेक्टर में पहले से मौजूद बड़ी कंपनियों के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं। कई क्षेत्रीय ब्रांड्स तेजी से उभर रहे हैं, जो बड़े पैमाने पर फॉर्मलाइजेशन से मिलने वाले फायदों की वजह से कम प्रॉफिट मार्जिन पर भी काम करने को तैयार हैं।

इसके अलावा, इन क्षेत्रीय ब्रांड्स का आकार भले ही छोटा हो, लेकिन वे ग्राहकों की अलग-अलग जरूरतों को समझकर उन्हें पूरा करने के लिए अच्छी तरह तैयार हैं।

क्विक कॉमर्स के बढ़ने से किराना स्टोर पर आधारित पुराना रिटेल मॉडल धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है। क्विक कॉमर्स शहरों में लोगों के खरीदारी करने के तरीके और रिटेल बिजनेस के इकोनॉमी को बदल रहा है।

इस बदलाव को देखते हुए FMCG कंपनियों को अपनी सेल्स और वितरण रणनीति पर दोबारा विचार करना होगा। उन्हें प्रोडक्ट्स की बेहतर और जरूरत के हिसाब से रेंज रखनी होगी, ऐसे छोटे पैक (SKUs) लाने होंगे जिन्हें ग्राहक आसानी से अपना सकें और अलग-अलग तरह के ग्राहकों की जरूरतों के हिसाब से प्रोडक्ट्स और ऑफर्स तैयार करने होंगे।

जो कंपनियां अपने जनरल ट्रेड नेटवर्क को बेहतर बनाने के साथ-साथ मॉडर्न रिटेल में भी मजबूत पकड़ बना चुकी हैं, वे इस बड़े और स्थायी बदलाव का सामना करने के लिए बेहतर स्थिति में हैं।

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